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Friday, 2 January 2015

समय का जाल

मैं बीत गयी इक और साल ...

लम्हे-लम्हे कुछ ठहरी सी
लम्हा-लम्हा ही बढ़ी चली
विकट रहा समय का जाल
मैं बीत गयी इक और साल ...

रोयी तो मुस्कायी भी
सपनों की परछाई सी
अभी सुकूं अभी बेहाल
मैं बीत गयी इक और साल ...

पलकें ना झपकाई थीं
रात कहाँ मुरझाई थी
जलना जिसे, बुझी मशाल
मैं बीत गयी इक और साल ...

हवा पे जैसे महक बसी
धूप-छाँव सम चंचल सी
हर लम्हा अजब ही चाल
मैं बीत गयी इक और साल ...

पेशानी गहराई सी
उम्र की ज़द में आयी सी
गया समय हुआ कंकाल
मैं बीत गयी इक और साल ...


Tuesday, 7 October 2014

अवशिष्ट

डूबते-डूबते फिर  
धीरे-धीरे उबरती हूँ 
छितरी हुई  
बिखरी सी 
सागर के थपेड़ों से टूटी 
रह जाती हूँ मात्र अवशिष्ट समान 

जानती हूँ ... मैं ही हूँ दुर्गा 
मैं ही सिंदूर खेलती स्त्री 
और मैं ही हूँ वो अभिशप्त 
जिससे छीना गया अधिकार 
सिंदूर खेलने का 
दुर्गा-सम कहलाने का 

... और फिर जान जाती हूँ 
भले ही मिट्टी गढ़ ली जाती है बार-बार 
पर सिंदूर-दान की छाया को 
टूटी-बिखरी 'दुर्गा' को  
फिर कभी नहीं दिया जाता 
लाल रंग का तनिक-सा भी अधिकार 

 

Saturday, 19 July 2014

चाँद के लिये

मखमली रूई के फाहे सा 
बादलों से चुहल करता 
ग़ज़लों में बसा आशिक़ 
महबूबा ... नज़्मों-रुबाई का 
रातों का सूरज 
सितारों का शहंशाह 
आसमान के सहन में 
इठलाता था चाँद 
चांदनी बिखेरता ... 
अपनी गोलाइयों पर 
मुस्कुराता था चाँद 
आसमां से पिघल ... पानी में 
अकसर उतर आता था चाँद 

इक रोज़ ... 
मचलती नन्हीं भूख भी 
चाँद से भरमा गयी 
चाँद घुल गया भूख में 
और भूख हो गयी पानी 

औकात से ज़्यादा का लालच !!!
तब से नाराज़ आसमां 
अँधेरे से लौ लगाये बैठा है 
बूँद-बूँद उतरता पानी में 
चाँद के लिये ... 
इन्साफ की कसमें उठाये बैठा है 

(शब्द-व्यंजना जुलाई-2014)



Monday, 14 April 2014

अधिकार का सवाल

लोमड़ की टोली ने जम कर शिकार किया 
माँस इकठ्ठा कर दावतें उड़ायीं 
लहू के रंगों से आतिश सजायी 
जो जी भर गया तो 
कुछ निशानियाँ रख लीं जश्न की 
और पूँछ फटकारते 
फेंक दिये माँस के लोथड़े सड़ने के लिये 

उनके साथ चले आये थे 
खून सने पंजों के निशान 
उनके दाँतों में अभी भी 
कुछ टुकड़े माँस अटका रहा था 
सड़ांध से उठती तेज़ गंध 
पूरे जंगल पर मंडराने लगी 
जंगल चीत्कार उठा 
लोमड़ों की तलाशी हुई 
और कील ठोंक दी गयीं उनकी पूँछ में 

दोष किसका है  ... 
स्याना लोमड़ बता रहा है 
कि अकसर दावत उड़ाता रहा 
शिकार खुद लोमड़ के साथ 
अब ... 
सारे लोमड़ एकजुट किये जा रहे हैं 
जंगल के खिलाफ 
जंगल-राज नहीं चलने दे सकते वो 
कोई कुछ भी कहे 
शिकार तो होना ही चाहिये 
ये अधिकार का सवाल है 

Saturday, 22 March 2014

बंदिनी

देखो! रोज़ की तरह
उतर आयी है
सुबह की लाली
मेरे कपोलों पर
महक उठी हैं हवायें
फिर से ...
छू कर मन के भाव
पारिजात के फूल
सजाये बैठे हैं रंगोली
पंछी भी जुटा रहे हैं
तिनके नये सिरे से
सजाने को नीड़
सुनो! कोयल ने अभी-अभी
पुकारा हमारा नाम
अच्छा,कहो तो...
आज फिर लपेट लूँ
चंपा की वेणी अपने जूडे में
या सजा लूँ लटों में
महकता गुलाब

ओह! कुछ तो कहो
याद करो ... तुमने ही बाँधा था मुझे
प्रेम के ढ़ाई अक्षर में
माना समय के साथ दौड़ते
तुम हो गये हो
परिष्कृत और विराट



Monday, 10 March 2014

संबंधों की धुरी

मेरे तुम्हारे संबंधों की
क्यूँ सदा पृथक रही धुरी

जो तुम रहे सदा से तुम
मात्र मेरे लिये ही क्यूँ
लक्ष्मण-रेखित परिधि विषम
स्वीकृत थी जब जानकी
अग्नि-परीक्षा क्यूँ रची
कैसी प्रीत की रागिनी

मेरे तुम्हारे संबंधों की
क्यूँ सदा पृथक रही धुरी

नदिया की जल-धारा से
नव-जीवन सोपान चढ़ा
पाकर जल तुम मेघ बने
जग-जीवन संचार किया
हरीतिमा तो समेट ली
मरूभूमि क्यूँ रीती खड़ी

मेरे तुम्हारे संबंधों की
क्यूँ सदा पृथक रही धुरी

स्वयं विज्ञापित जलधि तुम
हृदय विशाल सम दीखते
चन्द्र का फिर रूप धारे
स्वयं पर इतराते फिरे
सरित-समागम करके भी
क्यूँ ना तनिक मिठास भरी

मेरे तुम्हारे संबंधों की
क्यूँ सदा पृथक रही धुरी


Monday, 23 December 2013

संबंधों के रेशे



संबंधों के रेशे
कुछ मुलायम कुछ चुभते से
शून्य से हो के शुरू
नित नये समीकरणों से गुज़रते
पहुँचना चाहते थे
जहाँ हम दोनों हों समान हक़दार

संबंधों के रेशे
कुछ मुलायम कुछ चुभते से
सहेज कर पिरोते ताना-बाना
सरल से जटिल की ओर
बुनना चाहते थे बूटे
जिनमें रंग सभी हों चमकदार

संबंधों के रेशे
कुछ मुलायम कुछ चुभते से
अहम के आकड़ों में
रह गये उलझे ...घायल
टूटे ताने-बानों में
बिखरे बूटों को समेटते
रोज़ बदल रहे हैं
तुम्हारा और मेरा किरदार


Sunday, 1 December 2013

क्यूंकि ...

मुझे स्वीकारना था
जो भी दिया गया
हँस कर ...विनम्रता से
सामंजस्य बिठाना था
हर सुख हर दुःख से
पिंजरे वही थे
आस-निराश के
आँसू और मुस्कान के
बस ...बदल गया था
हवाओं का रुख और
पानी का स्वाद
...बदल गये थे
कुंजी से खेलते हाथ

मुझे स्वीकारना था
जो भी दिया गया
हँस कर ...विनम्रता से
क्यूंकि नहीं होता
अपना आसमान
पिंजरे के पंछी के पास
और ना ही होती है
अपनी कोई धरती
सलाखों पर टिके पाँव की
सपने नहीं होते आँखों में
भरी होती है कृतज्ञता
आधी मुठ्ठी दानों के वास्ते

मुझे स्वीकारना था
जो भी दिया गया
हँस कर ...विनम्रता से
बिना प्रश्न किये कि
किसने लिखे ये नियम
किसने बनाया संविधान
क्यूँ हो मेरी इच्छा से इतर
मेरी नियति का निर्धारण

हाँ ....मैंने मारी है चोंच
उन्हीं हाथों को ...
जिनमे भरे थे दाने मेरे वास्ते
क्यूंकि मुझे चाहिये थी
फूलों की महक से लदी
मेरे हिस्से की ड़ाल
आज़ाद बादलों से भरा
मेरे हिस्से का आकाश
वो सुख और वो दुःख भी
जिन्हें बाँट सकूँ अपनों के साथ
थक चुकी हूँ  ...आँसू की ताल पर
ख़ुशी का गीत गाते
अब बढ़ चली हूँ मैं
...तुम्हारी हद से बाहर
क्यूंकि .........
नहीं स्वीकारना मुझे
हँस कर ...विनम्रता से
पिंजरे का जीवन


Monday, 25 November 2013

याद



कब से पड़ी थी चौखट पे
नैनन में थी समाये रही
आ थोडा तुझे निचोड़ लूँ
अरी !बच के कहाँ जायेगी

करती है मुझसे दिल्लगी
नये खेल काहे रचाय री
धर लूँगी बैया आज तो
अरी !बच के कहाँ जायेगी

कूक-कूक मन को रिझाये
फुदके है ज्यूँ मुनिया कोई
ले पंख तेरे मैं भी उड़ूँ
अरी !बच के कहाँ जायेगी

Thursday, 7 November 2013

हवायें

लौ को बचाने की जुगत में
ढीठ हवाओं से जूझ रहे थे
.....कुछ मासूम दिये
जाने कब ...अचानक
मनचली हवाओं ने लहरा कर
......तीली और बारूद
उड़ा दी....रोशनी की सारी कतरनें
अब रह गया है शेष .....
चीख .....धुंआ
बेबसी के टुकड़े
और नमकीन आँखों में
बुझी चिंगारियों की राख 

हवाओं पे मचलता
नेपथ्य का संगीत
आज भी गुनगुनाता है
वही पुराना ख़ुशनुमा  गीत
फिर भी जाने क्यूँ ...
मायने ....बदले से लगते हैं 
ख़ुशी की जगह अब
चिपक गये हैं अर्थ ....घावों पर
...नमक की तरह

अनवरत ...अबाधित
अपनी सुविधा से
बही जा रही हैं  ....
हवाओं को नहीं होता सरोकार
दिये की मासूमियत से

Friday, 25 October 2013

अनबूझा प्रश्न



वो शब्द अलंकार
जिन्होंने गढ़ी
प्रेम की परिभाषा
मेरे तुम्हारे बीच
मेरी कल्पना थी
कविता थी
या ...थे तुम

स्वप्नों का ब्रह्मांड
जिसमें पूरक ग्रहों से
करते रहे परिक्रमा
मैं और तुम
मेरी कल्पना है
कविता है
या हो तुम

काल से चुराया एक पल
जिसको पाकर
बढ़ गयी जिजीविषा
मुझमें ... तुम में
मेरी कल्पना है
कविता है
या हो तुम

Thursday, 26 September 2013

एक कविता लिखनी है...


शब्द ...गहरे अर्थों वाले
भाव ...कुछ मनचले से
श्वास भर समीर ......चंचल महकी
सफेद चंपा ......कुछ पत्तियाँ पीली
एक राग मल्हार
एक पूस की रात
घास ...तितलियाँ
बत्तख ...मछलियाँ
फूलों के रंग ...वसंत का मन
तड़प ...थोड़ी चुभन
स्मृति की धडकन
एक माचिस आग
एक मुठ्ठी राख
एक टुकड़ा धूप
चाँद का रुपहला रूप
सब बाँधा है आँचल में
और हाँ ...एक सितारा
बस एक ...अपने नाम का
टाँका है अपने गगन में

रुको ! कुछ स्वार्थ भी भर लूँ
.....संवेदना के भीतर
एक कविता जो लिखनी है मुझे ...
अपने ऊपर- 
 

Wednesday, 4 September 2013

सनद

सितारे जड़े आँचल में
चाँद सा चेहरा किया
और अन्तरिक्ष की डोर
थमा दी मेरे हाथ 
अब घिरी हूँ मैं ग्रहों से
अपनी धुरी पे नाचती
न भीतर न बाहर
परिधि की लकीर भर 
....दुनिया मेरे पास

नहीं ...बेवजह न था
सनद में लिखना तुम्हारा
आकाश मेरे नाम

Monday, 26 August 2013

शब्द आग-आग है.....

ज़हर है शिराओं में
शब्द आग-आग है
कलम के सिरों पे अब
धधक रही मशाल है

रूह की बेचैनियाँ
स्याह रंग बदल रहीं
चल रही कटार सी
लिए कई सवाल है

ध्वस्त हैं संवेदना
लोटती अंगार पे
अर्थ हैं ज्वालामुखी
लावे में उबाल है

स्वप्न चढ़ चले सभी
वेदना की सीढ़ियाँ
नज़्म के उभार में
लहू के भी निशान हैं

बस्तियाँ उम्मीद की
जल रहीं धुँआ-धुँआ
छंद-छंद वेदना
प्रलाप ही प्रलाप है

उभर रहीं हैं धारियाँ
पाँत-पाँत घाव सी
बूँद-बूँद स्याही में
जाने क्या प्रमाद है 

Monday, 12 August 2013

अवसान के द्वार पर ...

स्वच्छ श्वेताकाश में बदलियाँ
किसे चल रहीं पुकारती
बूँदें ....आसमान से टपक
रह जातीं अधर में लटकी
दूर ....चटख रंगों का इंद्र-धनुष
कानों में गूँजती कोयल की कूक ....
शायद वही .....नहीं ....पता नहीं !!
मखमली घास के बिस्तर पर चुभन सी
रंगीन पंखुड़ियाँ ....दूर हैं ?....पास हैं ?
क्यूँ है उलझन सी ???
बह जाने की चाहत
और हवा इतनी मद्धम
कुछ घुटन ...कुछ बेचैनी
नाड़ियों में थमने लगी है ...
तरसी आँखों की नमी
जाने फरिश्तों की क्या है मर्ज़ी !!

समीप खड़ा बाहें पसारे
जीवन का अवसान
संग ले आया है ...स्वर्ग की सीढ़ी
फिर भी ....प्रतीक्षित नयन द्वार पे
आता होगा तारनहार 
चख लूँ ज़रा ...अंतिम बार
इन आँखों से ...ममता की नमी
ओह !
क्या रहेगी ये प्रतीक्षा भी निहारती
...अनंत की ठगनी   

Monday, 22 July 2013

दास्तां समझ आती नहीं .....

खो गया वजूद मेरा यूँ 
वक़्त की सख्त दरारों में 
मेरे हिस्से की धूप अब 
मुझ तक ही आ पाती नहीं 

आसमां पे टँगा रहा जो  
मीनारों तक पहुंचा है 
बिखरे टुकड़े चाँदनी,पर 
छत तक सीढ़ी जाती नहीं

तारों की झिलमिलाहट में
सपने भी मुस्कुराये थे  
अँधेरा हुआ है आसमां 
सपनों को सुध आती नहीं 

हर मरहला जवां रौनकें
दिशाओं में है रवानगी 
क्यूँ उलझी राहें इस कदर 
मंज़िल किधर बताती नहीं 

नर्म बादलों के कारवां 
बरसते गुज़रे आँगन से 
सदी पुरानी है बात ये 
अब मन को बहलाती नहीं 

दरो दीवार ही खो गये 
बेहिस ज़िन्दगी सँवारते 
जीत और कब हार अपनी 
दास्तां समझ आती नहीं  

Friday, 12 July 2013

ख्वाहिश की झील

ख्वाहिशों की झील में
काई ने घर बनाया है
नीला सा आसमान
थोड़ा सा धुंधलाया है

किनारों की सील में  
गहराता है सन्नाटा
खरपात ने दरारों में
फिर आसरा सजाया है

सीढ़ियाँ लिये बैठी हैं  
खामोशी के कदम
युगों से कोई प्यासा भी
इस तरफ कहाँ आया है

आलीशान गुम्बदी
कुकुरमुत्ती हवेली से  
भरमाये हैं मण्डुक
आह!क्या रुतबा पाया है

अमरबेल का हरियाया फर्श
मछलियों की छत पर
चुपके से पाँव  पसार
बढ़ता चला आया है

पानी को ललचायी
साहिल पे बंधी डोंगी
उदास किनारों को  
इस ने हमराज़ बनाया है

अमलतास से लिपटा
झील का सूना कोना
गुमचों में उमंगें भरता  
इकलौता परछाया है

Wednesday, 3 July 2013

चंचल नदी

आत्ममुग्धा आत्ममग्न
कलकल कर चली निनाद
पर्वत-पर्वत उलाँघती
बही जाती थी चंचल नदी

हरियाली को पंख लगा
निपट जीव को कर सजीव
अमिय रस धाराओं सी
बही जाती थी चंचल नदी

निर्मल काया सजल हृदय
तरल सुकोमल स्पर्श से
उपल-शिलायें तराशती
बही जाती थी चंचल नदी

पखार तप्त रवि-वल्लरी
झिलमिल आँचल पसार
वारिद पे जीवन वारती
बही जाती थी चंचल नदी

मन-वचन औ' कर्म में भी
छेड़ सृजन की रागिनी
पग-पग जीवन सँवारती
बही जाती थी चंचल नदी

कुत्सित विध्वंस पाश में
जा गिरी धारा थी निश्छल
विस्फरित नयन ताकती
अकुलायी बहुत चंचल नदी

पादप-विहीन पर्वतों में
खोजती है हरित मग
उन्मत बल-वेग धारती
छटपटाती है चंचल नदी

शनै:शनै: घटती हिल्लोर
कोण-कोण के ह्रास से
पतित अवशेष निस्तारती
मलिन हो रही चंचल नदी

विपदा में है घिरी खड़ी
भागीरथी असहाय सी
कब तक सहेगी त्रास ये
बह न पाएगी चंचल नदी 

Sunday, 23 June 2013

धरती का रुदन



आज मद में चूर है 
कल रोयेगा ज़ार-ज़ार 
धरती के आंचल को यूँ 
ना कर तू तार-तार 
पर्वत-शिलायें कर देगीं 
अहम के टुकड़े हज़ार 
सागर भी लील जायेगा 
घमंड का कारोबार 
मरुभूमि के व्यंग का 
तब होगा कोई जवाब ?
नागफनी के फूलों से 
कब सजे किसी के ख्वाब !
सूरज का अट्टाहास जब 
भेदेगा तेरे कर्ण 
काँच से चुभ जायेगें 
रेत के भी तृण 
चांदनी भी मैली धूसर 
आग ही बरसायेगी 
उन्मत्त वायु प्रचंड तरंगें 
तन-मन झुलसा जायेगीं 
सूखे जल-प्रवाह से 
कैसे बुझेगी प्यास ?
ठूँठ हुये तट-बंधों पर 
कब तक पालेगा आस ?
धरती का रुदन ही फिर 
बन जायेगा श्राप 
बस पीड़ा संग होगी तेरे 
और होगा संताप 
कह पायेगा जीत इसको 
जब ख़ाली होगें हाथ !
सन्नाटों की बस्ती में 
फिर रोती होगी तान 
मत कर कोशिश बनने की तू 
जगत-पिता भगवान 
 कर ले जीवित मन में बस 
एक सच्चा इंसान .

Thursday, 6 June 2013

कठपुतलियाँ

सुनाती हैं कहानियाँ 
यहाँ की वहाँ की 
धरती आसमां की 
या फिर ...होते हैं वो 
छूटे किनारे !!
....कौन जाने 
सच है क्या ....और क्या छलावे .

दे रखी है ड़ोर 
पराये हाथों में 
नाचती हैं इशारों पर 
या फिर ....होते हैं मजबूर 
नचाने वाले !!
....कौन जाने 
सच है क्या ....और क्या छलावे .

थिरकती मचलती हैं 
सज-धज के संग 
बेपरवाह बेमोल
या फिर ...होते हैं ये 
तिनके से सहारे 
....कौन जाने 
सच है क्या ....और क्या छलावे .

ये किस्से ये कहानी 
वो इशारों की रवानी 
थिरकना मचलना 
उलझना ....उलझाना 
मनमर्ज़ी है ...या फिर 
दुनियावी दिखावे 
....कौन जाने 
सच है क्या ....और क्या छलावे .