नरम गर्म सूरज का गोला
कितना प्यारा कितना भोला
जग सोये, ये फिर भी जागे
देख इसे अँधियारा भागे।
ऊषा की लाली बिखराये
ओस की बूँदों को पिघलाये
दूर क्षितिज से बढ़ता आये
पर्वत-पर्वत चढ़ता जाये।
माथे चढ़ जग के मुस्काये
भांति-भांति के खेल दिखाये
सर्दी में नरमी जतलाये
गर्मी में अग्नि बरसाये।
संध्या तक ये चलकर जाये
नव-रंगों की छटा सजाये
रात के आने से कुछ पहले
जाते दिन को विदा कराये।
उजियारों के लेकर साये
दूर देस फिर सैर को जाये
कल आएगा रवि का टोला
फिर खोले किरणों का झोला।
