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Sunday, 1 December 2013

क्यूंकि ...

मुझे स्वीकारना था
जो भी दिया गया
हँस कर ...विनम्रता से
सामंजस्य बिठाना था
हर सुख हर दुःख से
पिंजरे वही थे
आस-निराश के
आँसू और मुस्कान के
बस ...बदल गया था
हवाओं का रुख और
पानी का स्वाद
...बदल गये थे
कुंजी से खेलते हाथ

मुझे स्वीकारना था
जो भी दिया गया
हँस कर ...विनम्रता से
क्यूंकि नहीं होता
अपना आसमान
पिंजरे के पंछी के पास
और ना ही होती है
अपनी कोई धरती
सलाखों पर टिके पाँव की
सपने नहीं होते आँखों में
भरी होती है कृतज्ञता
आधी मुठ्ठी दानों के वास्ते

मुझे स्वीकारना था
जो भी दिया गया
हँस कर ...विनम्रता से
बिना प्रश्न किये कि
किसने लिखे ये नियम
किसने बनाया संविधान
क्यूँ हो मेरी इच्छा से इतर
मेरी नियति का निर्धारण

हाँ ....मैंने मारी है चोंच
उन्हीं हाथों को ...
जिनमे भरे थे दाने मेरे वास्ते
क्यूंकि मुझे चाहिये थी
फूलों की महक से लदी
मेरे हिस्से की ड़ाल
आज़ाद बादलों से भरा
मेरे हिस्से का आकाश
वो सुख और वो दुःख भी
जिन्हें बाँट सकूँ अपनों के साथ
थक चुकी हूँ  ...आँसू की ताल पर
ख़ुशी का गीत गाते
अब बढ़ चली हूँ मैं
...तुम्हारी हद से बाहर
क्यूंकि .........
नहीं स्वीकारना मुझे
हँस कर ...विनम्रता से
पिंजरे का जीवन


15 comments:

  1. कई बार जीवन ऐसे ही बाँध देता है पिंजड़े में. कितना भी हाथ पैर मारो, उनकी तीलियाँ नहीं टूट पाती हैं. ऐसे में मनुष्य को पिंजड़े के मालिक को कोसने के अलावा चारा क्या रह जाता है. आखिर उन्मुक्तता से अच्छा क्या है इस जीवन में . शब्द-शब्द ह्रदय को छू रहें हैं. बहुत प्रवाह है कविता में.

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  2. बहुत ही बढ़िया


    सादर

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  3. चोंच दानों से भरे हाथों पर ही मारा जाता है,क्योंकि प्यार वहीँ होता है .... शुष्क शाखों पर चोंच क्या मारना और उम्मीद भी कैसी !
    बहुत ही बढ़िया

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  4. बहुत सुंदर उत्कृष्ट प्रवाह पूर्ण रचना ....!
    ==================
    नई पोस्ट-: चुनाव आया...

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  5. excellent expression with deep emotions

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  6. बहुत ही सुन्दर.. नारी के सदियों से दमित इच्छा को सुन्दर विद्रोहात्मक शब्द दिया है आपने .. भला कोई क्यों स्वीकारें उसे जो उसे स्वीकार्य नहीं ..

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  7. नारी मन की इच्छाओं को बाखूबी बयाँ किया है ...

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  8. जो भी आपने स्वीकारा हो, बेहतरीन है !! सुंदरतम !!

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  9. कल 04/12/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद!

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  10. बहुत-बहुत धन्यवाद आपका

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  11. स्वीकारना तो अब भी होता है. हर कोई में चोंच मार कर अपना हक़ लेने की ताकत कहाँ होती है. हौसला बढ़ाती रचना के लिए बधाई.

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  12. विद्रोह की तेजपूर्ण प्रस्तुति...

    बधाई.

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  13. आज़ाद मन की अपनी उड़ान होती है,पिंजरे में मन कैद हो बेवशी से ऐसा ही फड़फड़ा कर उड़ना चाहता है , स्वछंद आकाश में.खूबसूरत भावो से सजी सुन्दर प्रस्तुति.आभार

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  14. नारी मन की भावनाओं का बहुत भावपूर्ण और सटीक चित्रण...

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