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Monday, 25 November 2013

याद



कब से पड़ी थी चौखट पे
नैनन में थी समाये रही
आ थोडा तुझे निचोड़ लूँ
अरी !बच के कहाँ जायेगी

करती है मुझसे दिल्लगी
नये खेल काहे रचाय री
धर लूँगी बैया आज तो
अरी !बच के कहाँ जायेगी

कूक-कूक मन को रिझाये
फुदके है ज्यूँ मुनिया कोई
ले पंख तेरे मैं भी उड़ूँ
अरी !बच के कहाँ जायेगी

8 comments:

  1. Kya khoob likhti hai aap, kamal hai.

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  2. बहुत प्यारी कविता......यादों से बच पाना मुश्किल...

    अनु

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  3. मधुर ... कोमल एहसास लिए भाव पूर्ण रचना ...

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  4. BEAUTIFUL LINES WITH GREAT EMOTIONS

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  5. प्यारी यादों के तो बस ऐसे ही बाँध कर रखने का मन होता है. बहुत सुन्दर रचना.

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  6. सुन्दर यादों के एहसास को खूबसूरती से शब्दों में पिरोया है .. सुन्दर कविता ..

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  7. खूबसूरत रचना......!!
    यादें जेहन में घर बना लेते हैं

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  8. अहा ! कितना सुन्दर लिखा है..

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