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Friday, 2 January 2015

समय का जाल

मैं बीत गयी इक और साल ...

लम्हे-लम्हे कुछ ठहरी सी
लम्हा-लम्हा ही बढ़ी चली
विकट रहा समय का जाल
मैं बीत गयी इक और साल ...

रोयी तो मुस्कायी भी
सपनों की परछाई सी
अभी सुकूं अभी बेहाल
मैं बीत गयी इक और साल ...

पलकें ना झपकाई थीं
रात कहाँ मुरझाई थी
जलना जिसे, बुझी मशाल
मैं बीत गयी इक और साल ...

हवा पे जैसे महक बसी
धूप-छाँव सम चंचल सी
हर लम्हा अजब ही चाल
मैं बीत गयी इक और साल ...

पेशानी गहराई सी
उम्र की ज़द में आयी सी
गया समय हुआ कंकाल
मैं बीत गयी इक और साल ...


6 comments:

  1. समय बड़ा बलवान .....सुन्दर भावपूर्ण रचना

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  2. सच कहा ही समय तो वैसे ही रहता है... इंसान बीतता है ...
    नव वर्ष मंगलमय हो ...

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  3. सोलह आने सच्‍च्‍ी और खरी बात। समय तो जस का तस है, सिर्फ इंसान ही गुजरता जाता है।

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  4. सुंदर अभिव्यक्ति

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    start selling more copies, send manuscript

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  6. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "भूली-बिसरी सी गलियाँ - 9 “ , मे आप के ब्लॉग को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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