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Wednesday, 3 July 2013

चंचल नदी

आत्ममुग्धा आत्ममग्न
कलकल कर चली निनाद
पर्वत-पर्वत उलाँघती
बही जाती थी चंचल नदी

हरियाली को पंख लगा
निपट जीव को कर सजीव
अमिय रस धाराओं सी
बही जाती थी चंचल नदी

निर्मल काया सजल हृदय
तरल सुकोमल स्पर्श से
उपल-शिलायें तराशती
बही जाती थी चंचल नदी

पखार तप्त रवि-वल्लरी
झिलमिल आँचल पसार
वारिद पे जीवन वारती
बही जाती थी चंचल नदी

मन-वचन औ' कर्म में भी
छेड़ सृजन की रागिनी
पग-पग जीवन सँवारती
बही जाती थी चंचल नदी

कुत्सित विध्वंस पाश में
जा गिरी धारा थी निश्छल
विस्फरित नयन ताकती
अकुलायी बहुत चंचल नदी

पादप-विहीन पर्वतों में
खोजती है हरित मग
उन्मत बल-वेग धारती
छटपटाती है चंचल नदी

शनै:शनै: घटती हिल्लोर
कोण-कोण के ह्रास से
पतित अवशेष निस्तारती
मलिन हो रही चंचल नदी

विपदा में है घिरी खड़ी
भागीरथी असहाय सी
कब तक सहेगी त्रास ये
बह न पाएगी चंचल नदी 

13 comments:

  1. बहुत ही सुन्दर तरीके से आपने उसकी पूरी यात्रा और मनोदशा वर्णित कर दी.....उत्कृष्ट !!!!

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  2. कल कल सी बहती रचना.

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  3. वैसे तो आपकी सभी कविताएँ बहुत ही अच्छी होती हैं परन्तु ये रचना आपकी सर्वश्रेष्ठ रचनाओं मे से एक है। शब्दों का उत्कृष्ट चयन और कविता का प्रवाह शुरु से आखरी तक एक समान है मानों कोई सरिता अविरल बह रही हो। मैनें बहुत पहले कहा था आपको साक्षात् सरस्वती माँ का आशीर्वाद प्राप्त है और आज प्रमाणित भी हो गया।

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  4. निर्मल और निश्छल सरिता की जीवन यात्रा का और संभावी भावों का उत्कृष्ट और रोचन प्रस्तुतीकरण।

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  5. waah...nadi ke veg samaan praavyukt rachna...sundar aur sarthak lekhan ke liye bahut bahut bahdaai.

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  6. बहुत ही बढ़िया


    सादर

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  7. This comment has been removed by the author.

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  8. आपकी इस उत्कृष्ट रचना के लिंक की प्रविष्टी सोमवार (08.07.2013) को ब्लॉग प्रसारण पर की जाएगी. कृपया पधारें .

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  9. सुन्दर प्रस्तुति बहुत ही अच्छा लिखा आपने .बहुत बधाई आपको .

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  10. कल कल छल छल करती नदी की दास्तान लिख दि है ...
    नदी के विभिन्न आयाम ...

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  11. सुन्दर नदी गाथा । नदी नाराज होती है तो फिर देखलो कि क्या-क्या कहर ढाती है ।

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  12. नदी का बहुत सुन्दर रूप दर्शाया आपने । कल कल बहती नदी सदा शोभन लगती है । बधाई । सस्नेह

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