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Thursday, 6 June 2013

कठपुतलियाँ

सुनाती हैं कहानियाँ 
यहाँ की वहाँ की 
धरती आसमां की 
या फिर ...होते हैं वो 
छूटे किनारे !!
....कौन जाने 
सच है क्या ....और क्या छलावे .

दे रखी है ड़ोर 
पराये हाथों में 
नाचती हैं इशारों पर 
या फिर ....होते हैं मजबूर 
नचाने वाले !!
....कौन जाने 
सच है क्या ....और क्या छलावे .

थिरकती मचलती हैं 
सज-धज के संग 
बेपरवाह बेमोल
या फिर ...होते हैं ये 
तिनके से सहारे 
....कौन जाने 
सच है क्या ....और क्या छलावे .

ये किस्से ये कहानी 
वो इशारों की रवानी 
थिरकना मचलना 
उलझना ....उलझाना 
मनमर्ज़ी है ...या फिर 
दुनियावी दिखावे 
....कौन जाने 
सच है क्या ....और क्या छलावे .

19 comments:

  1. वाह.....
    बहुत सुन्दर...
    गहरी बात!!!

    अनु

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  2. कठपुतलियां----
    सहजता से कही गयी गहन अनुभूति
    मार्मिक और भावपूर्ण रचना
    सादर

    आग्रह है मेरे ब्लॉग का भी अनुसरण करें
    गुलमोहर------

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  3. नाचती इशारों पर ..या नचाने वाले मजबूर ....बहुत सुंदर .बहुत खूब !

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  4. या फिर होते हैं यह
    तिनके से सहारे......
    वाह ....बहोत सुन्दर.....!!!!

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  5. बहुत ही खुबसूरत जीवन की व्याख्या

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  6. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार(8-6-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
    सूचनार्थ!

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    Replies
    1. शुक्रिया .....बहुत-बहुत आभार

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  7. सूत्रधार का क्रीड़ाकौतुक - नाच चलता रहे ,सारी डोरियाँ उसके हाथ.कठपुतलियाँ दिखायेंगी सारे भाव-अनुभाव !

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  8. बहुत खुबसुरत रचना। लाजवाब

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  9. वाह बहुत गहरे भाव. सुंदर.

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  10. आपने लिखा....हमने पढ़ा
    और लोग भी पढ़ें;
    इसलिए कल 09/06/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    आप भी देख लीजिएगा एक नज़र ....
    धन्यवाद!

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    Replies
    1. बहुत-बहुत शुक्रिया ...........आभार

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  11. Kaun Jane Sach Hai Kya,Kya Hai Chhalawe... Bilkul Sahi.

    Sadar

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  12. उमा दारु जोषित की नाईं, सबह नचावत राम गोसांई.

    सुंदर प्रस्तुति.

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  13. बहुत सुंदर। कठपुतलियाँ बेरंग, निर्जीव होकर भी एक बेहद सुंदर और सुहाना संसार रचती हैं हमारे सामने।

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  14. शिखा : अरे दर्शनशास्त्र....!! सुंदर. :)

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  15. सच और छलावे में बस विश्वास का अंतर होता है ... छलावा ज्यादा देर तक नहीं रह पाता ...
    गहरे भाव लिए रचना ...

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