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Saturday, 25 May 2013

इनकार की कीमत.



सागर सी गहरी आँखों में 
खाली एक धुंआ सा है  
सूरज तो कब का डूब चुका 
अब तो बस अमावस्या है 
मेले थे जिन राहों में 
नागफनी उग आयी है 
अपनी ही मंज़िल है लेकिन 
खुद से ही कतराई है 
स्वाद सुगंध कब बीत गए 
यादों में भी याद नहीं
सन्नाटे कहकहे लगाते  
और कोई संवाद नहीं 
झुलस गये सपनों की गाथा 
हर कोने में साबित है 
नाखूनों के पोरों तक में 
चिंगारी का हासिल है 
अपनी छाया भी नाज़ुक थी 
दर्पण ने कब झूठ कहा 
क्यूँ ज़ख्म खुले आईने के 
क्यूँ अक्स ड़रा सहमा-सहमा 
एक पल ने जो त्रास दिया 
अम्ल न फिर वो क्षार हुआ 
एक इनकार की कीमत है  
सौदा यही  हर बार हुआ 

(ये रचना एसिड-अटैक की पीड़ितों को समर्पित है )

Tuesday, 7 May 2013

क्या हूँ मैं ?



कलाई से कांधों तक आभूषित 
एक नारी का प्रतिमान 
मोअन-जो-दाड़ो में दबा 
मेरा अनकथ संसार 
क्या हूँ मैं ?
पन्नों में सिमटा .....
मात्र एक युगीन वृत्तान्त ??? 

खोया सारा समर्पित अतीत 
लक्ष्मण-रेखा के पार 
अग्नि भी जला ना पायी 
एक संशय का तार 
क्या हूँ मैं ???
युग-युग से पोषित मानस में 
मर्यादा का प्रचार ???

इच्छा-प्राप्ति से संलग्न 
आशीष में बसा श्राप 
सप्त वचन के उपहास से 
बिंधा आत्म-सम्मान 
क्या हूँ मैं ?
धर्म-युद्ध पर आरोपित 
मुर्ख अहंकार का प्रतिकार ???

देवी से दासी तक झूलता 
एक अनसुलझा विचार 
सदी दर सदी स्थापित 
मानवता का संस्कार 
क्या हूँ मैं ?
बाज़ार के अनुरूप बदलता 
(चित्र गूगल के सौजन्य से)
मात्र एक उत्पाद ???