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Friday, 12 July 2013

ख्वाहिश की झील

ख्वाहिशों की झील में
काई ने घर बनाया है
नीला सा आसमान
थोड़ा सा धुंधलाया है

किनारों की सील में  
गहराता है सन्नाटा
खरपात ने दरारों में
फिर आसरा सजाया है

सीढ़ियाँ लिये बैठी हैं  
खामोशी के कदम
युगों से कोई प्यासा भी
इस तरफ कहाँ आया है

आलीशान गुम्बदी
कुकुरमुत्ती हवेली से  
भरमाये हैं मण्डुक
आह!क्या रुतबा पाया है

अमरबेल का हरियाया फर्श
मछलियों की छत पर
चुपके से पाँव  पसार
बढ़ता चला आया है

पानी को ललचायी
साहिल पे बंधी डोंगी
उदास किनारों को  
इस ने हमराज़ बनाया है

अमलतास से लिपटा
झील का सूना कोना
गुमचों में उमंगें भरता  
इकलौता परछाया है

11 comments:

  1. सीढियाँ लिए बैठी हैं ख़ामोशी के कदम.....
    वाह...
    अनुपम चित्रण shikha जी...
    बहुत सुन्दर!!!

    अनु

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  2. tumhari is rachna ne man moh liya ...udasi ka ghunghat odhe hue hain magar ekdum navyovna jaisi hai tumhari ye rachna ..bahut alag tarah ki upmaayein ...bahut komal anubhutiyaan ...bahut sundar leh badhh rachna ..badhai

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  3. शिखा : तीनों अंतरो में नये ताज़ा इडियम....!! सभी कमाल के. शून्यता.खिन्नता की बात करने का बिलकुल अलग अंदाज़-ऐ-बयाँ. शब्दों से बहुत अच्छा काम लिया है वाह-

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  4. शिखा : ये कैसे हो गया...!! कुछ तांत्रिक क्षति की वजह से शुरू में मैंने पहले तीन अंतरे ही पढ़े थे... माफ़ी-- शेष रचना अभी पढ़ी. ताजगी का अमल मुसलसल रहा है... नए शब्दप्रयोग और विभिन्न बिम्ब. केन्द्र भाव को और गहेराती पंक्तिया और गोया धुंध में तराशी हुई छबि....!! अभिनंदन...

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  5. बहुत सुंदर भावपूर्ण सृजन ,वाह वाह ...क्या बात है

    RECENT POST ....: नीयत बदल गई.

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  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति !
    डैश बोर्ड पर पाता हूँ आपकी रचना, अनुशरण कर ब्लॉग को
    अनुशरण कर मेरे ब्लॉग को अनुभव करे मेरी अनुभूति को
    latest post केदारनाथ में प्रलय (२)

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  7. नए बिम्ब .... बहुत सुंदर रचना ।

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  8. भाव मय रचना ... नए तरह के बिम्ब संजोए ...
    लाजवाब रचना ...

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  9. शिखा जी ख्वाहिशें अच्छी हैं ......

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  10. सभी शेर लाजवाब, बेहतरीन गजल.

    रामराम.

    ताऊ डाट इन

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  11. वाह! कितने सुन्दर मर्म को छू लेनेवाले अनूठे बिम्ब । बधाई । सस्नेह

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