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Thursday, 25 April 2013

आँसू ...

आँसू ..... एक सैलाब
हदों में उफनता बिलखता
या सेहरा में ....भटका समंदर
पत्थर पे सर पटकना
लहरों का बिखरना
सब है देखा-भाला

वेदना ....सुलगी लकड़ी
भीगे ख्यालों से नम
न जलती है ...न बुझ पाती
गीली लकड़ी का जलना
पल-पल सुलगना
सब है देखा-भाला

दिलासा ....महीन शब्द 
महज़ एक उलझन 
सुलझाओ तो ...हो जाते हैं तार-तार 
अर्थ हो गये हैं ग़ुम 
रिश्तों का चेहरा 
सब है देखा-भाला 

5 comments:

  1. आपने लिखा....
    हमने पढ़ा....
    और लोग भी पढ़ें;
    इसलिए शनिवार 06/07/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in
    पर लिंक की जाएगी.
    आप भी देख लीजिएगा एक नज़र ....
    लिंक में आपका स्वागत है .
    धन्यवाद!

    ReplyDelete
    Replies
    1. यशोदा जी आपका बहुत-बहुत धन्यवाद आपने रचना को मान दिया
      शुभ-कामनायें

      Delete
  2. बहुत ही कोमल, भावपूर्ण रचना..

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