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Tuesday, 21 January 2014

साँकल

कई नाग फुँफकारते हैं
अँधेरे चौराहों पर
अटकने लगती है साँसों में
ठिठकी सी सहमी हवायें
खौफनाक हो उठते हैं
दरख्तों के साये भी
अपने ही कदमों की आहट
डराती है अजनबी बन
सूनी राह की बेचैनी
बढ़ जाती है हद से ज़्यादा
तब ...
टाँक लेते हैं दरवाज़े
खुद ही कुंडियों में साँकल
कि इनमें क़रार है पुराना
रखनी है इन्हें महफूज़
ज़िंदगी की मासूमियत

संभल  रहना मगर ए ज़िंदगी !
होने लगती है लहूलुहान
कच्ची मासूमियत भी कभी
कुंडी में अटकी साँकल जब
हो जाती है दरवाज़ों से बड़ी

12 comments:

  1. होने लगती है लहूलुहान
    कच्ची मासूमियत भी कभी
    कुंडी में अटकी साँकल जब
    हो जाती है दरवाज़ों से बड़ी... बहुत कड़वा सच .. आपने सहजता और खूबसूरती से बयान किया , यही कविता की विशेषता होती है ... सुन्दर रचना के लिए बधाई ..

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  2. बहुत गहराई लिए ... सजग तो हमेशा ही रहना है नहीं तो बेरहम है ये दुनिया ...

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  3. और सांकल बनानेवाले बहुत अच्छे से जानते है मासूमियत ही सबसे आसान है सांकल लगाने के लिए. साम- दाम, दंड, भेद सब हजारों पन्नों में उद्धृत भी हैं . महसूस की जाने वाली रचना.

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  4. कल 25/01/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

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    Replies
    1. आपका बहुत-बहुत आभार ....

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  5. यथार्थ को आँखों में रेत की तरह डालती है ये रचना........ कुछ चुभती, कुछ बहती..........

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  6. आपकी रचनाओं मे एक अजीब सी कशमकश होती है ,,,गहराई होती है ,,कभी कभी ऐसा लगता है कई अनुभूतियाँ एक साथ हो रही हों ,,शायद यही वजह है की इन रचनाओं को पढ्न वाकई सुकून देता है ,,और यही सबकुछ यहाँ भी ,,,,दिल से बधाई आपको शिखा जी ,,,,,,,,,

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  7. सुन्दर कृति
    सादर....

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  8. सुन्दर रचना

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  9. कुंडी में अटकी साँकल जब
    हो जाती है दरवाज़ों से बड़ी...

    dil mein utarti kavita ....

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  10. संभल के रहना ए जिंदगी :)
    ___________________
    ये लंबी सांकल क्या न करवाए !!
    बहुत बेहतरीन !!

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  11. Aapki to har rachna ek se badhkar ek hai Shikha Ji!! Aapko aise hi Guruji thori hi bola jata hai..sari poetry pe comments possible nhi tha iske liye sorry..

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