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Wednesday, 4 September 2013

सनद

सितारे जड़े आँचल में
चाँद सा चेहरा किया
और अन्तरिक्ष की डोर
थमा दी मेरे हाथ 
अब घिरी हूँ मैं ग्रहों से
अपनी धुरी पे नाचती
न भीतर न बाहर
परिधि की लकीर भर 
....दुनिया मेरे पास

नहीं ...बेवजह न था
सनद में लिखना तुम्हारा
आकाश मेरे नाम

12 comments:

  1. वाह...क्या खूबसूरत ख़याल है।

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  2. बेहद सुन्दर कविता.....
    गहरे एहसास लिए...
    बहुत खूब शिखा जी.

    अनु

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  3. वाह बहुत सुंदर अहसास
    उत्कृष्ट प्रस्तुति


    आग्रह है मेरे ब्लॉग में भी पधारें
    कब तलक बैठें---

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  4. Bahut khoob ...
    Sury bhi to dhuri hai is antariksh ki ... Bhav may rachna ...

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  5. क्‍या बात है .... बहुत खूब

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  6. बहुत ही बढ़िया



    सादर

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  7. दीदी वाह मज़ा आ गया।

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  8. बहुत सुंदर रचना...

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  9. pyari si kavita.... gahre ahsaas..:)

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  10. यह सनद प्रभावशाली लगती है शिखा जी ...
    बधाई !

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  11. बहुत सुंदर प्रस्तुति. आकाश सी फैली कल्पना

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