Monday, 14 April 2014

अधिकार का सवाल

लोमड़ की टोली ने जम कर शिकार किया 
माँस इकठ्ठा कर दावतें उड़ायीं 
लहू के रंगों से आतिश सजायी 
जो जी भर गया तो 
कुछ निशानियाँ रख लीं जश्न की 
और पूँछ फटकारते 
फेंक दिये माँस के लोथड़े सड़ने के लिये 

उनके साथ चले आये थे 
खून सने पंजों के निशान 
उनके दाँतों में अभी भी 
कुछ टुकड़े माँस अटका रहा था 
सड़ांध से उठती तेज़ गंध 
पूरे जंगल पर मंडराने लगी 
जंगल चीत्कार उठा 
लोमड़ों की तलाशी हुई 
और कील ठोंक दी गयीं उनकी पूँछ में 

दोष किसका है  ... 
स्याना लोमड़ बता रहा है 
कि अकसर दावत उड़ाता रहा 
शिकार खुद लोमड़ के साथ 
अब ... 
सारे लोमड़ एकजुट किये जा रहे हैं 
जंगल के खिलाफ 
जंगल-राज नहीं चलने दे सकते वो 
कोई कुछ भी कहे 
शिकार तो होना ही चाहिये 
ये अधिकार का सवाल है 

Saturday, 22 March 2014

बंदिनी

देखो! रोज़ की तरह
उतर आयी है
सुबह की लाली
मेरे कपोलों पर
महक उठी हैं हवायें
फिर से ...
छू कर मन के भाव
पारिजात के फूल
सजाये बैठे हैं रंगोली
पंछी भी जुटा रहे हैं
तिनके नये सिरे से
सजाने को नीड़
सुनो! कोयल ने अभी-अभी
पुकारा हमारा नाम
अच्छा,कहो तो...
आज फिर लपेट लूँ
चंपा की वेणी अपने जूडे में
या सजा लूँ लटों में
महकता गुलाब

ओह! कुछ तो कहो
याद करो ... तुमने ही बाँधा था मुझे
प्रेम के ढ़ाई अक्षर में
माना समय के साथ दौड़ते
तुम हो गये हो
परिष्कृत और विराट