मेरे तुम्हारे संबंधों की
क्यूँ सदा पृथक रही धुरी
जो तुम रहे सदा से तुम
मात्र मेरे लिये ही क्यूँ
लक्ष्मण-रेखित परिधि विषम
स्वीकृत थी जब जानकी
अग्नि-परीक्षा क्यूँ रची
कैसी प्रीत की रागिनी
मेरे तुम्हारे संबंधों की
क्यूँ सदा पृथक रही धुरी
नदिया की जल-धारा से
नव-जीवन सोपान चढ़ा
पाकर जल तुम मेघ बने
जग-जीवन संचार किया
हरीतिमा तो समेट ली
मरूभूमि क्यूँ रीती खड़ी
मेरे तुम्हारे संबंधों की
क्यूँ सदा पृथक रही धुरी
स्वयं विज्ञापित जलधि तुम
हृदय विशाल सम दीखते
चन्द्र का फिर रूप धारे
स्वयं पर इतराते फिरे
सरित-समागम करके भी
क्यूँ ना तनिक मिठास भरी
मेरे तुम्हारे संबंधों की
क्यूँ सदा पृथक रही धुरी
क्यूँ सदा पृथक रही धुरी
जो तुम रहे सदा से तुम
मात्र मेरे लिये ही क्यूँ
लक्ष्मण-रेखित परिधि विषम
स्वीकृत थी जब जानकी
अग्नि-परीक्षा क्यूँ रची
कैसी प्रीत की रागिनी
मेरे तुम्हारे संबंधों की
क्यूँ सदा पृथक रही धुरी
नदिया की जल-धारा से
नव-जीवन सोपान चढ़ा
पाकर जल तुम मेघ बने
जग-जीवन संचार किया
हरीतिमा तो समेट ली
मरूभूमि क्यूँ रीती खड़ी
मेरे तुम्हारे संबंधों की
क्यूँ सदा पृथक रही धुरी
स्वयं विज्ञापित जलधि तुम
हृदय विशाल सम दीखते
चन्द्र का फिर रूप धारे
स्वयं पर इतराते फिरे
सरित-समागम करके भी
क्यूँ ना तनिक मिठास भरी
मेरे तुम्हारे संबंधों की
क्यूँ सदा पृथक रही धुरी