Monday, 10 March 2014

संबंधों की धुरी

मेरे तुम्हारे संबंधों की
क्यूँ सदा पृथक रही धुरी

जो तुम रहे सदा से तुम
मात्र मेरे लिये ही क्यूँ
लक्ष्मण-रेखित परिधि विषम
स्वीकृत थी जब जानकी
अग्नि-परीक्षा क्यूँ रची
कैसी प्रीत की रागिनी

मेरे तुम्हारे संबंधों की
क्यूँ सदा पृथक रही धुरी

नदिया की जल-धारा से
नव-जीवन सोपान चढ़ा
पाकर जल तुम मेघ बने
जग-जीवन संचार किया
हरीतिमा तो समेट ली
मरूभूमि क्यूँ रीती खड़ी

मेरे तुम्हारे संबंधों की
क्यूँ सदा पृथक रही धुरी

स्वयं विज्ञापित जलधि तुम
हृदय विशाल सम दीखते
चन्द्र का फिर रूप धारे
स्वयं पर इतराते फिरे
सरित-समागम करके भी
क्यूँ ना तनिक मिठास भरी

मेरे तुम्हारे संबंधों की
क्यूँ सदा पृथक रही धुरी


Tuesday, 21 January 2014

साँकल

कई नाग फुँफकारते हैं
अँधेरे चौराहों पर
अटकने लगती है साँसों में
ठिठकी सी सहमी हवायें
खौफनाक हो उठते हैं
दरख्तों के साये भी
अपने ही कदमों की आहट
डराती है अजनबी बन
सूनी राह की बेचैनी
बढ़ जाती है हद से ज़्यादा
तब ...
टाँक लेते हैं दरवाज़े
खुद ही कुंडियों में साँकल
कि इनमें क़रार है पुराना
रखनी है इन्हें महफूज़
ज़िंदगी की मासूमियत

संभल  रहना मगर ए ज़िंदगी !
होने लगती है लहूलुहान
कच्ची मासूमियत भी कभी
कुंडी में अटकी साँकल जब
हो जाती है दरवाज़ों से बड़ी