Saturday, 19 July 2014

चाँद के लिये

मखमली रूई के फाहे सा 
बादलों से चुहल करता 
ग़ज़लों में बसा आशिक़ 
महबूबा ... नज़्मों-रुबाई का 
रातों का सूरज 
सितारों का शहंशाह 
आसमान के सहन में 
इठलाता था चाँद 
चांदनी बिखेरता ... 
अपनी गोलाइयों पर 
मुस्कुराता था चाँद 
आसमां से पिघल ... पानी में 
अकसर उतर आता था चाँद 

इक रोज़ ... 
मचलती नन्हीं भूख भी 
चाँद से भरमा गयी 
चाँद घुल गया भूख में 
और भूख हो गयी पानी 

औकात से ज़्यादा का लालच !!!
तब से नाराज़ आसमां 
अँधेरे से लौ लगाये बैठा है 
बूँद-बूँद उतरता पानी में 
चाँद के लिये ... 
इन्साफ की कसमें उठाये बैठा है 

(शब्द-व्यंजना जुलाई-2014)



Monday, 14 April 2014

अधिकार का सवाल

लोमड़ की टोली ने जम कर शिकार किया 
माँस इकठ्ठा कर दावतें उड़ायीं 
लहू के रंगों से आतिश सजायी 
जो जी भर गया तो 
कुछ निशानियाँ रख लीं जश्न की 
और पूँछ फटकारते 
फेंक दिये माँस के लोथड़े सड़ने के लिये 

उनके साथ चले आये थे 
खून सने पंजों के निशान 
उनके दाँतों में अभी भी 
कुछ टुकड़े माँस अटका रहा था 
सड़ांध से उठती तेज़ गंध 
पूरे जंगल पर मंडराने लगी 
जंगल चीत्कार उठा 
लोमड़ों की तलाशी हुई 
और कील ठोंक दी गयीं उनकी पूँछ में 

दोष किसका है  ... 
स्याना लोमड़ बता रहा है 
कि अकसर दावत उड़ाता रहा 
शिकार खुद लोमड़ के साथ 
अब ... 
सारे लोमड़ एकजुट किये जा रहे हैं 
जंगल के खिलाफ 
जंगल-राज नहीं चलने दे सकते वो 
कोई कुछ भी कहे 
शिकार तो होना ही चाहिये 
ये अधिकार का सवाल है