Tuesday, 19 March 2013

यात्रा ...भोर तक

चन्द्र खींचता रात की बग्घी
तारे अपलक ताक रहे थे
ढली हुई पलकों में सज के
स्वप्न सलोने झाँक रहे थे.
मंद-मंद विहसित बयार थी
कुसुम सुगंधी टाँक रहे थे
चन्द्र-प्रभा के घिरते बादल
रजत-चदरिया ढांक रहे थे.
अर्ध-निद्रा में खोयी वसुधा
निशि-चक क्षिति लाँघ रहे थे
पार क्षितिज ऊषा के पंछी
उजला रस्ता नाप रहे थे.
आह ! पहुँच निकट भोर के द्वारे
रात के चक्के हाँफ रहे थे
मयंक स्वेद-कणों के मनके
पंखुरियों पे काँप रहे थे.
किरणें आरूढ़ काल के रथ पे
देव-सूर्य अश्व हांक रहे थे
अहा ! स्वागत में प्रभात के
अंबर रश्मियाँ तान रहे थे.
कुछ ही पल थे शेष विहान में
दिश पूरब खग आँक रहे थे
उजली किरणों के स्वागत में
पंकज पांख पसार रहे थे .

Tuesday, 12 March 2013

चाहती हूँ यकीन कर लेना ...

'हर सपना साकार हो सकता है '
सचमुच ???
अभी जा कर पूछती हूँ .....
उन माँओं से ....
सत्य का पाठ पढ़ाकर
जीवन संग्राम में उतार आयीं जो
....अपनी संतानों को
और बदले में पाये अस्थि के फूल ...
सत्य की विजय के वादे
असत्य से ....
पूछती हूँ कलावतियों से ....
भलाई का संकल्प लिये
जो उतर पड़ीं समाज की कीचड़ में
नहीं उबर पातीं लेकिन
किसी भी सदी में
उस दलदल से ....
पूछती हूँ उन स्त्रीयों से
जो हस्तांतरित कर दी जाती है
पिता से पति तक
अधिकार विहीन
मर्यादित कर्तव्य में लिपटी
संस्कृति की डोर से
क्या सचमुच हर सपना
साकार हो सकता है ???
चाहती हूँ यकीन कर लेना
इस सपने पर ...
पर नहीं ...
यथार्थ का अट्टाहास
कुछ और ही समझाता है
हर सपना साकार कहाँ हो पाता है !!!